द सिंधिया स्कूल फोर्ट के 122वें स्थापना दिवस पर पद्मश्री लीला सैमसन ने कहा, साधना की कोई उम्र नहीं

 

ग्वालियर. साधना को एक शब्द में बया नहीं किया जा सकता बता चाहे कला की साधना की हो या फिर शिक्षा की। यह मन से किया जाने वाला रियाज है जिसकी कोई सीमा और उम्र नहीं होती। जब मैं चेन्नई में थी तब वहां की महिलाएं रोजाना सूरज उगने से पहले उठतीं और अपने घरों की देहरी पर चावल के आटे से कोलम बनाती। यह रंगोली की तरह आकृति होती है उनकी यह परंपरा किसी एक दिन की नहीं बल्कि 365 दिन चलने वाली एक प्रक्रिया थी जिसे मैंने साधना के रूप में देखा और वहीं से मुझे साधना की सही अर्थ पता चला। यही साधना छात्रों को भी अपनी पढ़ाई में करनी चाहिए तभी जीवन में सफल हो सकेंगे। यह बात भरतनाट्यम की प्रर्सिद्ध नृत्यांगना पद्मश्री लीला सैमसन ने कही। वह द सिंधिया स्कूल फोर्ट में आयोजित 122वें स्थापना दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रही थी। सोमवार को इस तीन दिवसीय समारोह का समापन हुआ।
कार्यक्रम में स्कूल के बोर्ड ऑफ गर्वनर के अध्यक्ष व पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मौजूद रहे। स्कूल प्राचार्य डॉ. माधवदेव सारस्वत ने स्कूल की रिपोर्ट पढ़ी। स्कूल के बोर्ड ऑफ गर्वनर के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक कहानी सुनाते हुए कहा कि चिडि़या से बड़ा मेहनती कोई नहीं होता। वह अपना घौंसला बनाती है और एक तेज हवा उसका घर उजाड़ देती है लेकिन वह फिर भी उदास नहीं होती और अपने पंखों की ताकत से वह दुबारा आसमान में उड़जाती है क्योंकि उसे अपनी ताकत का अहसास है कि उसके पास पंख है। इस कहानी से छात्रों को भी प्रेरणा लेनी होगी कि आपकी ताकत शिक्षा है जिसके बल पर विपरीत परिस्थतियों में भी आप अपनी पहचान बना सकते है। बस जरूरत है तो ईमानदारी और पूरी लगन के साथ पढ़ाई करने की जिससे आप भी चिडि़या की तरह सफलता की ऊंचाईयों तक पहुंच सकें।
ये हुई सांस्कृतिक प्रस्तुतियां
समारोह में स्कूल छात्रों ने ऑर्केस्ट्रा की प्रस्तुति दी इसके बाद फॉरबिटन द फ्रूट थीम पर डांस का आयोजन हुआ इससे पूर्व छात्रों ने स्कूल के ब्रास बैंड से अतिथियों का स्वागत किया।

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